लड़के कभी रोते नहीं

Amarjeet Singh
आया था मैं जब दुनिया में, मां बाप मेरे थे मुस्करा उठे। इकलौता ऐसा दिन था जब रोता देख मुझे, वो दोनों थे खुश हो रहे। क्योंकि उसके बाद फिर कभी आई नहीं, आंखों में आंसू की धार मेरे। चलने की कोशिश में जब गिरता था मैं, आंसू की बूंदें आईं आंखों में मेरे। लेकिन मेरे रोने से पहले ही, एक आवाज पड़ी कानों में मेरे। लड़की नहीं हो तुम फिर, ये आदत किसने लगाई तुम्हें ! फिर ये बात सिखाई, मिल कर मुझको सभी ने। लड़का हो तुम और, लड़के कभी नहीं हैं रोते। छोटा था मैं इतना कि, समझ इतनी नहीं थी मुझमें। फिर चोट लगने पर भी सदा, आंसू अपने लगा रोकने । बड़ा हुआ फिर धीरे धीरे, ये बात बिठा कर अपने मन में। कुछ भी हो जाए, आंसू कभी भी, नहीं आ सकते इन आंखों में। बचपन से ही टॉपर था मैं, डिगा आकर के नौवीं में। क्योंकि उस वक्त मिला था धोखा, मुझको अपनी दोस्ती में। सबसे अच्छा दोस्त था छूटा, एक छोटी सी गलतफहमी से। रोना भी आता था मुझको पर, रोक लेता था आंसू इन आंखों में। फिर खुद ही संभाला खुद को, आगे बढ़ा इस जिंदगी में। क्योंकि ये सब सोचने का, समय नहीं था मेरे जीवन में। सपना था कि फौजी बनूं मैं, देश का रक्षक बन करके। पर मेरे इस सपने से, मेरी मां डरती थीं ऐसे। लडूंगा सीमा पर खड़े हो, एक में ही अकेला जैसे । खैर, छोड़ दिया इस सपने को, और ख्वाब नया देखा मैंने। वैज्ञानिक मैं बनूंगा और, आविष्कार करूंगा नए नए। पर इसी वक्त पिता भी मेरे, साथ हमारा छोड़ गए। कांधे पर लेकर अर्थी उनकी, शमशान घाट पहुंचा था मैं। किसी ने ना पूछा हाल मेरा, कि अंदर से कैसा हूं मैं। तब भी मैं रो ना सका था, इस धारणा के कारण समाज के। इस छोटी सी उम्र में थी आ गई, परिवार की जिम्मेदारियां मुझ पे। सपने सारे छोड़ कर अपने, काम करने चल पड़ा मैं। ख्वाबों कर अपने जला कर अर्थी, जिम्मेदारियां पूरी करने लगा मैं। तकलीफ तब भी बहुत हुई थी, पर रो नहीं सकता था मैं। कहने को था बहुत कुछ पर, किसी को कुछ बता नहीं सकता था मैं। धीरे धीरे ये समय भी बीता, और वो आई मेरे वीरान जहां में। लगा था कि संगिनी होगी मेरी, वो इस जालिम दुनिया में। खोल कर दिल के दरवाजों को, इसमें उसे बसाया था मैंने। पर जब मुझको छोड़ गई वो, तब भी रो नहीं सका था मैं। उससे भी कुछ बोल न पाया, जिस लड़की से शादी की मैंने। आखिर वो भी आई थी अपना, घर छोड़, मेरे मकान को घर बनाने। जब बेटी फूल सी मेरी आई, पहली बार इन हाथों में मेरे। आंखें तब भी भर थीं आईं, जिन्हें बहने से रोका था मैंने। लेकिन सब सोचा सब कुछ, मैंने अपने बुद्धि विवेक से। तब जाकर पहुंचा था मैं, इस सही निष्कर्ष पे। किसने ये निर्णय लिए और, किसने ये ऐसे नियम बनाए। मर्द को दर्द नहीं होता, हमें ये संभाषण दिए। इन्हीं विचारों के चलते, बाहर से मजबूत बना रहा मैं। लेकिन अंदर ही अंदर था, पूरी तरह से टूट रहा मैं। जिस बात का कोई अर्थ नहीं, उसको था लेकर चल रहा मैं। हो गया बहुत अब खुद को, और प्रताड़ित नहीं करूंगा मैं। रोए थें कृष्ण भी तब जब, राधा का वियोग हुआ था उनसे । और तब भी रोए थे जब द्रौपदी का, हुआ था चीरहरण बीच सभा में। रोए थे मेरे राम लला भी, माता सीता के वियोग में। जब क्रोधित होकर इस संसार से, समा गई थीं वो धरा में। इस समाज के आदर्श है जो, उनके भी आंसू बहे थे। फिर हम लड़के आखिर, क्यों नहीं रो हैं सकते। क्यों जब कोई लड़का रोए, तो हम उसे लड़की हैं बोलते। क्या सिर्फ लड़कियों को हक है रोने का, हम लड़के क्यों नहीं रो सकते। बस बहुत हुआ अब ये सब नहीं, सिखाऊंगा मैं बच्चों को अपने । छूट दूंगा उनको कि वो, पूरे करें अपने सारे सपने। भेद कोई नहीं रखूंगा, अपने बेटी और बेटे में। सारे हक बेटी को दूंगा तो बेटे को भी, अधिकार होगा कि वो भी रो सके। पूरा जीवन लग गया मेरा, केवल ये बात समझने में। लेकिन नहीं आने दूंगा, ये सवाल मेरे बेटे के मन में। अधिकार होंगे उसको कि वो भी, अपने दिल की बात कह सके। जरूरत पड़े तो आंसू बहा कर, अपने दिल को हल्का कर सके। जो कुछ भी सह है मैंने अब, उनको नहीं सहने दूंगा मैं। गलत धारणाओं को खत्म कर, बदलाव ये करूंगा मैं। और अब ये परिवर्तन जरूरी है, केवल मुझमें ही नही, बल्कि इस समाज में। समझना होगा लोगों को भी कि, लड़कों के दुख पर भी ध्यान दें। ~ देव श्रीवास्तव " दिव्यम"